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दोस्तों कोई चेहरा आइना होता है, कोई चेहरा फूल होता है, कोई चेहरा चाँद होता है, कोई चेहरा किताब होता है और कोई चेहरा क़यामत भी होता है, पेश है चेहरे पर कुछ खूबसूरत शायरी.

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मैं अपने साज़ के नग्मों की नर्म लहरों में

तुम्हारे चेहरे की अफ़्सुर्दगी डुबोता हूँ

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हुरूफ़-बीं तो सभी हैं मगर किसे ये शुऊर,

किताब पढ़ती है चेहरे किताब-ख़्वानों के !!

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हर दफ़ा वही चेहरे बारहा वही बातें,

इन पुरानी यादों में कुछ नया नहीं रखा !!

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चाँद सूरज मेरी चौखट पे कई सदियों से

रोज़ लिक्खे हुए चेहरे पे सवाल आते हैं

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आईने पर यक़ीन रखते हैं,

वो जो चेहरा हसीन रखते हैं

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सिर्फ चेहरा ही नहीं शख्सियत भी पहचानो ,

जिसमें दिखता हो वही आईना नहीं होता

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यही चेहरा..यही आंखें..यही रंगत निकले,

जब कोई ख्वाब तराशूं..तेरी सूरत निकले

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ताआज़्ज़ुब है तेरा चेहरा है के मैख़ाना

नज़र..लब..रुख़सार..पेशानी में जाम रक्खे हैं

हमारा हाले दिल चेहरे से अब दिलदार पढ़ लोगे

ज़ुबां आंखों की समझोगे,तो मेरा प्यार पढ़ लोगे

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आपकी फ़ितरत के चेहरे थे कई समझे नहीं

जो था शाने पर उसे,चेहरा समझ बैठे थे हम

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अपना चेहरा न बदला गया

आईने से ख़फ़ा हो गए…

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वहीं कहीं नज़र आता है आप का चेहरा

तुलू चाँद फ़लक पर जहाँ से होता है

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अक़्स उभरेगा ‘नफ़स’ गर्द हटा दे पहले,

धुंधले आईने में चेहरा नहीं देखा जाता

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तेरा चेहरा मुकम्मल एक ग़ज़ल मतले से मकते तक

क़यामत है,क़यामत है,क़यामत है,क़यामत है

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अव्वल अव्वल की मोहब्बत के नशे याद तो कर

बे-पिए भी तिरा चेहरा था गुलिस्ताँ जानाँ

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हम फिर भी अपने चेहरे न देखें तो क्या इलाज,

आँखें भी हैं चराग़ भी है आइना भी है !!

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अपने चेहरे को बदलना तो बहुत मुश्किल है

दिल बहल जाएगा आईना बदल कर देखो !!

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अक़्स उभरेगा ‘नफ़स’ गर्द हटा दे पहले

धुंधले आईने में चेहरा नहीं देखा जाता

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लक़ब हुस्ने-दो-आलम का उसे हरगिज़ नहीं मिलता

के जिसके चाँद से चेहरे पे कोई तिल नहीं आए

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मैं बंद आंखों से पढ़ता हूं रोज़ वो चेहरा,

जो शायरी की सुहानी किताब जैसा है.!!

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“अभी कुछ और हो इंसान का लहू पानी

अभी हयात के चेहरे पे आब-ओ-ताब नही ”

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बेनकाब चेहरे हैं, दाग बड़े गहरे हैं

टूटता तिलिस्म आज सच से भय खाता हूं

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अपने चेहरे से जो जाहिर है छुपाएँ कैसे

तेरी मर्ज़ी के मुताबिक़ नज़र आएँ कैसे.!!

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उन से पूछो कभी चेहरे भी पढ़े हैं तुम ने

जो किताबों की किया करते हैं बातें अक़्सर.!!

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चेहरे बदल-बदल के मुझे मिल रहे हैं लोग

ये क्या ज़ुल्म हो रहा है,मेरी सादगी के सांथ.!!

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चेहरा पढ़ लेने से खुलता नहीं दिल का सब हाल

एक नॉवेल में कई बाब हुआ करते हैं.!!

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आईने बे-सबब नहीं हैराँ

कोई चेहरा बदल रहा होगा..!!

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रूह का क़र्ब भी चेहरे पे सजा लाए हैं

हम खदो-ख़ाल को आईना बना लाए हैं.!!

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ना दिखा पायेगा तू ख्वाब मेरी आँखों के

अब भी कहता हूँ मुसव्विर मेरा चेहरा न बना.!!

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हमें पढ़ाओ ना रिश्तों की कोई और क़िताब

पढ़ी है बाप के चेहरे की झुर्रियाँ मैंने.!!

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सजा के चेहरे पे , सच्चाईयाँ निकलता है

वो जिसका झूट पे , सब क़ारोबार चलता है..!!

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ग़मो की धूप में भी मुस्कुरा कर चलना पड़ता है

ये दुनिया है यहाँ चेहरा सजा कर चलना पड़ता है

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ख़ुद ख़ुशी लिखी थी एक बेवा के चेहरे पर मगर

फ़िर वो ज़िन्दा हो गई बच्चा बिलखता देख कर..!!

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अपना चेहरा न बदला गया।।

आईने से खफ़ा हो गए…!!

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सर-ए-महफ़िल निगाहें मुझ पे जिन लोगों की पड़ती है

निगाहों के हवाले से वो चेहरे याद रखता हूँ..!!

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मेरी आवाज़ हि पर्दा है मेरे चेहरे का

मैं हूँ खामोश जहाँ मुझको वहाँ से सुनिये..!!

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कितने चेहरे थे हमारे आस-पास

तुम हि तुम दिल में मगर बसते रहे..!!

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